तुम्हारी कमी
स्कूल से जब थक कर आती,
और तुम्हारे फोन कि घंटी पर्स रखने से पहले ही बज जाती,
याद है मुझे कभी कभी तो कार भी नही पार्क कर पाती,
पर तुम्हारा फोन बजने लगता
कभी कभी थकान और परेशानियों से मैं झुझला भी जाती !
पर आज!
आज तो सिर्फ एक इंतज़ार ही रह गया है,
इंतज़ार तुम्हारे फोन का,
तुम्हारी आवाज़ का,
और फिर दूर तक खामोशी का!
हो तुम आस पास ही मेरे यह एहसास है मुझे,
पर दिखती नही, यही दर्द है मुझे।
तुम्हारे ना होने का दर्द कभी कम हो नही सकता
तुम्हें एक पल के लिए भी भूल जाऊँ,
ये हो नही सकता।
तुम्हारी याद को दिल में समेट लिया है
माँ,
तुम्हारे ना होने को *अब* हमने कबूल कर लिया है।
माँ
नम्रता