बंद कमरे और मैं

*बंद कमरे और मैं* 

बंद कमरे भी डर जाते हैं, 
खोलने उन्हें जब मैं पहुंचती हूँ! 
वे भी सिसक जाते हैं, 
खुलने की दस्तक पाकर! 
सोच कर घबरा जाते हैं, 
क्या जवाब देंगे,
 कल तक जो भरे थे
तुम्हारे आने से, 
आज तुम्हारे घर से चले जाने से, 
तकते है फिर राह
तुम्हारे आने की! 
तुम्हारे आने से वीरान
पड़े कमरो में भी जान
आ जाती थी! 
मैं उनको और वे मुझको, 
देखकर मुस्कुराते थे! 
पर तुम्हारे जाने से, 
मेरी तरह वो फिर से तकने लगते हैं
राह तुम्हारे आने की। 
ये कमरे ही हैं तुम्हारे, 
जो खुश हो जाते हैं, 
तुम्हारे आने से, 
खुश हो जाते हैं, 
कि उनकी तरह कोई और भी है
जो तकता है राह
तुम्हारे आने की! 
खोलती हूँ जब दरवाजा, 
धीरे से बोल जाते है
मत घबराओ पगली, 
मैं तेरे साथ हूँ, 
हम तुम दोनों साथ है, 
उस एक पल के इंतज़ार में, 
जब फिर से हम दोनों भर जायेंगे, 
फिर से खाली होने के लिए!

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