माँ

मन किया की आज  माँ के लिये कुछ लिखा जाए.. 
लिखने बैठी तो शब्दों ने कहा  मुझसे ना हो पाये.. 
पूछने लगे शब्द लिख पाऊँगी क्या उस *माँ* के बारे में जिसका ना कोई आदि  ना कोई अंत!! 

अंततः दशा  देख मेरी आ गये  ये शब्द... 

माँ के बारे में लिखना चाहती हो, अरे भोली ये क्या करना चाहती हो! 

माँ.....
जिसमे समाया सारा संसार! 
कितनी करुणामयी हैं वो, सदा सिखाती अच्छी बात! 

 *पुष्पा* नाम है उनका जिनके कोख से आई मैं.. 
सहंशील, निर्मल, पवित्र और बहादुर मेरी माँ.. 
जीवन पथ पर चलने की राह दिखाती मेरी माँ... 
इस दुनिया में सबसे ज्यादा स्नेह मुझसे करने वाली मेरी माँ... 

 *पुष्पा* के आंगन कि चिड़ीया... जब चली *शशि* कि बगिया में चहकने .. 
हुई ना उसको किचिंत भि फिक्र, 
होतीं भी कैसे?
 *शशि* नाम था उनका जो थी विशाल हृदय की रानी.. 
बाह फैलाकर.. 
जिसने समा लिया अपनी बाहों में... 
कभी न होने दिया एहसास सास होने का.. 
सदा किया माँ जैसा प्यार.. 

बैठी सोचने एक दिन मैं, 
क्या हो सकता हैं ईश्वर इतना भी महान्? 
जो दे दे दो आँचल इतने महान। 

पुष्पा शशि में अंतर क्या है.. यह बताना क्या होगा आसान? 
दोनों प्रेम, करुणा और सहनशीलता कि देवी, 
दोनों निश्चल, दोनों साहसी, परिवार के लिये जीवन समर्पित करने वाली, 

हे मेहेर! 
जब जब आऊ इस धरा पर देना स्नेह इन दोनों का 

यही विनती हैं तुमसे.. 
कोख मिले अगर एक कि, 
तो आगँन मिले दूजी का!! 

दोनों माँओ को समर्पित... हृदय के कुछ भाव!!

नम्रता

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